रविवार, 15 जून 2008

aap kahab ha

mujhe dek
h kar aapka mushkarana dejgi hu giii nyhgejjjdjdjjjk dekho mnera

शनिवार, 12 जनवरी 2008

चजई कुमाउनीगढ़वाली राजभाषा कैसे बने?

कुछ जागरूक नागारिकोँ ने कुमाउनी तथा गढ़वाली को उत्तराखंड की राजभाषा के रुप मैं प्रतिस्थापित करने की मांग की. कभी कभार इस विषय मैं बहस चलती रहती है,परन्तु सच तो यह है कि कुमाउनी तथा गढ़वाली भाषा है ही नहीं. yah bolee की श्रेणी मैं आती हैं. Or bolee हर पांच सात किलोमीटर मैं बदल जाती हैं हालांकि मोटे तौर पर उसका स्वरूप वही रहता है. भाषा का दर्जा प्राप्त करने कि लिए लिपि का होना आवश्यक है. इस समय यह देवनागरी मैं लिखी जाती है. कुमाउनी अति सम्रद्ध हैं. इसका साहित्य परिपूर्ण है. अब तो कुमाउनी तथा गढ़वाली मैं CD कैसेट व फिल्मोंभरमार है. दोनों अति भावपूर्ण बोलियाँ हैं, इनका भावार्थ समझने के लिए बहुत कुछ समझना व समझाना होगा. जैसे कोई बुजुर्ग किसी चंचल बाला को भावातिरेक हो, प्यार स्वरूप उलाहना देते हुई खर्युनी कहता है और वह लाडली अल्हर बालिका मंद मुस्कान लिए मुदित मन से इठलाती हुई चपल चितवन से निहारते हुई खेतों की और सरपट भाग जाती है. दुर्गन्ध को ही लें. कपरे जलने की दुर्गन्ध को हन्त्रीं, मिट्टी से आती गंध को मतें कहते है. इसी प्रकार गुवैन, किह्नाएँ, कुकैं, सनाएँ, भैसें आदि कहा जाता है. अन्य भाषाओँ मैं इतने विभिन्न प्रकार के शब्द नहीं पाए जाते. अंग्रेजी मैं जो लिखा जाता है वैसा पढ़ नहिउन जाता. जैसे बी उ टी बुत है तो पी उ टी पुट होता है. मात्र २६ अक्षरों हनी के बाबजूद इसकी उच्चारण शैली पूर्ण विकसित है. इस कारन अंगरेजी पूरे संसार की मान्य भाषा है. कुमाउनी को भाषा का स्थान देने के लिए देवनागिरी लिपि के लुप्त प्रे सब्दोँ का पुनः समावेश करना होगा, जैसे हलन्त, दीर्घ, विशार्ग, चन्द्रबिन्दु आदि का प्रयोअग करना होगा. संस्कृत सब भासोँ कि जननी है. संस्कृत से मदद लेकर देवनागरी को कुमाउनी लिखने योग्य बनाना होगा. इसका मानकीकरण कर, उच्चारण शैली विकसित करनी होगी तथा इसका सब्द्कोस बनाना होगा. इसका मानकीकरण कर उच्चारण शैली विकसित करनी होगी बिना व्याकरण के भाषा नहीं बन सकती, अतः इसका व्याकरण भी विकसित करमा होगा. अतः मैं समझता हूँ कि सबसे अवश्कीय है, स्याम को कुमाउनी या परेड कहने-कहलाने मैं गौरवान्वित महसूस करमा तथा कुमाउनी या गढ़वाली बोलने की पहल करना. इस प्रकार की सामूहिक पायल ही कुमाउनीतथा गढ़वालिऊ को भाषा के रुप मैं प्रतिस्थापित कर पायेगी. भाषा बनने के पशात हे कुमाउनी तथा गढ़वाली को राजभाषा का स्थान प्राप्त हो सक्गा. इस यथार्थ को जल्दी समझना हे ठीक होगा.

बुधवार, 26 दिसंबर 2007

kya kar raho ho मेरे भाई तुम सोअच लो क्या कर रहे हो sakal सकल शकल

गुरुवार, 20 दिसंबर 2007

You love to marry, we marry to love हम शादी करते हैं प्यार करने के लिए

एक विदेशी नागरिक ने एक बार विवेकानंद से पूछा कि भारत मैं लड़का लड़की बिना एक दूसरे से परिचित हुवे केवल माता पिता के कहने पर शादी क्यों कर लेते हैं तथा ज़िंदगी भर एक दूसरे का साथ निभाते हैं तथा शादी टूटती भी नहीं है. इसका क्या कारण है? स्वामी जी ने अंग्रेजी मैं जबाब दिया – यू लव तू मेरी वी मेरी तू लव आप प्यार करते हो शादी करने के लिए और हम शादी करते हैं प्यार करने के लिए . भारतीयता के अनुरूप कितना सही उत्तर दिया स्वामी जी ने. परन्तु आज कल टीवी मैं संयुक्त परिवारों कि भद्दी तस्वीर पेश की जा रही है. रोकना होगा तथा संयुक्त परिवार कि खूबियों से लोगों से परिचित कराना होगा. सामाजिक विघटन को रोकना होगा। इसमें सबका सहयोग चाहिए

शनिवार, 15 दिसंबर 2007

Patwari- पटवारी उत्तराखंड की निहत्थी पुलिस

चौंकाने की बात नहीं है पर यह सच है कि उत्तराखंड के ग्रामीण अंचल मैं निहत्थी पुलिस आज भी कार्य कर रही है. गाँधी के देस मैं अजूबा पटवारी अहिंसक पुलिस के रुप मैं पिछले २०० सालों से सुचारू रुप से कार्य कर रही है. धारा ३०२ जैसे जघन्य अपराध की जांच भी पटवारी ही करता है हथियार के नाम पर उसके पास एक डंडा ही होता है. मुलजिम को बंद करने के लिए कमरा भी नहीं होता. रात्रि को अपराधी को बंद करने हेतु वह अक्सर हत्गादी hatgari को अपराधी व खुद के हाथ मैं बांध लेटा था. पटवारी को वर्दी भी नहीं मिलती ऐसे मैं कौन अपराधी है कौन पटवारी पहिचानाना था. मुश्किल हो जाता. मैं संसार का एक मात्र अजूबा पटवारी ट्रेनिंग स्कूल है. पहाड़ कि शांत प्रिय जनता पटवारी व्यवस्था को अच्छा समझती है.

सोमवार, 10 दिसंबर 2007

बुरा मत देखो मैं क्या करूं

रविवार, 9 दिसंबर 2007

राम रमापति कर धनु लेहूँ खैन्चेहू चाप मिटे संदेहू

राम चरित मानस मैं सीता स्वयाम्बर की एक चौपाई है जिसे हम बचपन मैं इस प्रकार परते थे . राम रमापति कर धनु लेहूँ, खैन्चाहू चाप मिटे संदेहू. यह चौपाई बालकाण्ड के २८४ दोहे कि सातवीं पंक्ति पर है. इधर मैं जब बाल कांड पढ़ रह था तो मैं पाया कि खैन्चाहू चाप कि जगह खैन्चेहूँ मिटे मोरे संदेहू लिखा है खैन्चय्हू के बाद चाप सब्द नहीं है चाप के माने प्रत्यंचा या धनुष कि डोरी होता है. मैंने कुछ साल पहले गीता प्रेस गोरखपुर को पत्र लिखा परन्तु सही जबाब नहीं आया. राम भक्तों से निवेदन है कि क्या सही है बताएं वैसे तो राम कथा कैसे ही कह लिजेये राम का नाम लेने से मतलब है, फिर भी जिज्ञाषा शांत होना भी जरूरी है